कड़े नियमः संशोधित एफसीआरए नियमों का प्रभाव

New amendments to India's Foreign Contribution (Regulation) Act (FCRA) impose stricter compliance requirements and financial burdens on non-governmental organizations. Critics argue these rules are designed to stifle civil society by increasing administrative hurdles and limiting operational scope.
Why it matters
The tightening of NGO regulations raises significant concerns regarding the shrinking space for civil society and democratic oversight.
सिविल सोसाइटी संगठन स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत तथा नागरिक स्वतंत्रताओं व अधिकारों जैसे क्षेत्रों में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं और जहां सरकारी कदम अपर्याप्त साबित होते हैं वहां वे आगे आते हैं। फिर भी, भारतीय राज्य ने एनजीओ के साथ शक-शुब्हे वाला सलूक किया है। उसने उनके कामकाज पर सख्त पाबंदियां थोपने के लिए विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए), 2010 का इस्तेमाल किया है। उनके कामकाज को उनकी श्रेणी के लिए निर्धारित गतिविधियों तक और उनके पंजीकरण में उल्लिखित राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों तक सीमित करने के लिए, इसी हफ्ते एफसीआरए संशोधन नियमावली, 2026 अधिसूचित की गयी। उन्हें अपने सोशल मीडिया हैंडलों, वेबसाइटों और प्रकाशनों की जानकारी भी देनी होगी और उनमें “राजनीतिक सामग्री” होने पर रोक भी लगायी गयी है। नये नियम अस्वीकृत उद्देश्यों के लिए फंड का इस्तेमाल करने पर कड़े दंड लगाते हैं और एकल पंजीकरण शुल्क की पुरानी प्रणाली हटाकर एनजीओ के लिए यह जरूरी बनाते हैं कि वे कार्य की प्रत्येक श्रेणी के लिए और अपने कामकाज वाले प्रत्येक राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के लिए अलग-अलग शुल्क चुकाएं। यह अनुपालन का खर्च और कागजी काम बढ़ाता है। सरकार की दलील है कि ऐसे उपायों से पारदर्शिता, सबके साथ समान सलूक और राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन साफ है कि ये नियम एनजीओ के कामकाज अवरुद्ध करने के लिए हैं। एफसीआरए व्यवस्था का संचालन पारदर्शिता से बहुत दूर रहा है। जैसा कि सीपीआई (एम) सांसद जॉन ब्रिटास ने हाल में शिकायत की, एफसीआरए के निरस्तीकरण और नवीकरण न किये जाने पर संसदीय सवालों को “गोपनीय” बताकर इजाजत नहीं दी गयी है, जबकि पिछले एक दशक में अपारदर्शी आधारों पर 20,000 से ज्यादा पंजीकरण रद्द किये जा चुके हैं। पारदर्शिता बेहतर करने के बजाय, नये नियम एनजीओ पर ज्यादा अवरोधों व वचनबद्धताओं का बोझ डालकर यह चिंता बढ़ा रहे हैं कि सरकार की मंशा डर पैदा करने की है।
The article frames the government's actions as an attempt to 'stifle' NGOs and expresses skepticism toward the government's stated goals of transparency.
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